मेरी आज़ादी

कोई पूछे हम बच्चों से

आज़ादी है क्या बंधन से

हम तो कहते नया हो बचपन

वैसा हो जो होता बचपन

हम भी खेलें सब बच्चों संग

हम भी चाहें लड़ना संग संग

संग में पढ़ना

संग में लिखना

संग संग में सबके चलना

जो है चाहत मेरे मन की

वो मुझको लगती आज़ादी

नलिन वाधवा

बचपन

वैसे तो ये है एक कहानी

पर अब तक ना किसी ने जानी

मेरा मन क्या क्या कहता है

इसमें भी एक बच्चा रहता है

नहीं समझ ये आता मुझको

किस ग़लती का हूँ मैं नतीजा

ये भी सोच रहा हूँ अक्सर

जीवन आसान हो सकता था

वाह रे जीवन, तेरी क्या मर्ज़ी

बच्चों से कैसी ख़ुदगर्ज़ी ?

ये मत समझो कमज़ोर हैं हम

अलग हैं पर पुरज़ोर हैं हम

हम में भी हैं कई कला

हम तो हैं एक प्यारी सी बला

नहीं डरेंगे किसी से हम

जीवन में आये जो भी ग़म।

( उन सभी बच्चों को समर्पित जो अपने जीवन में आये मुश्किलों के रुके नही , झुके नही)